गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इस दिन भक्त घरों और पूजा स्थलों में गणपति की स्थापना करके दूर्वा, फूल, मोदक और अन्य सात्त्विक भोग अर्पित करते हैं।
गणेश चतुर्थी की कथा में माता पार्वती द्वारा गणेश की उत्पत्ति, भगवान शिव के साथ संघर्ष, गणेश को मिला प्रथम पूज्य स्थान और चंद्रदेव से जुड़ा प्रसंग बताया गया है।
गणेश चतुर्थी की कथा
एक बार माता पार्वती कैलाश पर्वत पर अपने निवास में थीं। स्नान करने से पहले उन्होंने सोचा कि द्वार पर कोई ऐसा होना चाहिए जो उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने दे।
माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगाए गए उबटन से एक सुंदर बालक की आकृति बनाई। अपनी दिव्य शक्ति से उन्होंने उस आकृति में प्राण डाल दिए और उसे अपना पुत्र स्वीकार किया। उस बालक का नाम गणेश रखा गया।
माता पार्वती ने गणेश से कहा:
“जब तक मैं अनुमति न दूं, किसी को भी भीतर प्रवेश मत करने देना।”
गणेश ने माता की आज्ञा स्वीकार की और द्वार पर पहरा देने लगे।
कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे। उन्होंने भीतर जाने का प्रयास किया, लेकिन गणेश ने उन्हें रोक दिया।
भगवान शिव ने बताया कि वे इस स्थान के स्वामी और माता पार्वती के पति हैं। फिर भी गणेश अपनी माता की आज्ञा पर अडिग रहे और उन्होंने भगवान शिव को प्रवेश नहीं दिया।
भगवान शिव के गणों ने भी बालक को समझाने और हटाने का प्रयास किया, लेकिन गणेश ने सभी का सामना किया। उनका संघर्ष बढ़ता गया।
अंततः क्रोधित भगवान शिव ने गणेश का मस्तक शरीर से अलग कर दिया।
माता पार्वती का क्रोध
स्नान के बाद माता पार्वती बाहर आईं और उन्होंने अपने पुत्र को मृत अवस्था में देखा। यह देखकर वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गईं।
उन्होंने कहा कि यदि गणेश को दोबारा जीवन नहीं मिला, तो वे अपनी शक्ति से सृष्टि में विनाश उत्पन्न कर देंगी।
देवताओं ने भगवान शिव से गणेश को जीवित करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया:
“उत्तर दिशा की ओर जाओ और सबसे पहले दिखाई देने वाले जीव का मस्तक लेकर आओ।”
गणों को सबसे पहले एक हाथी दिखाई दिया। वे उसका मस्तक लेकर लौटे। भगवान शिव ने हाथी का मस्तक गणेश के शरीर से जोड़ दिया और अपनी दिव्य शक्ति से उन्हें पुनः जीवित कर दिया।
अपने पुत्र को जीवित देखकर माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ।
गणेश प्रथम पूज्य कैसे बने?
भगवान शिव ने गणेश को आशीर्वाद देकर घोषणा की:
- गणेश सभी गणों के अधिपति होंगे।
- हर शुभ कार्य से पहले उनका पूजन किया जाएगा।
- उनका स्मरण करने से भक्त को बुद्धि और विवेक की प्रेरणा मिलेगी।
- वे विघ्नों को नियंत्रित करने वाले विघ्नेश्वर कहलाएंगे।
तभी से भगवान गणेश को गणपति, गणाधिपति, विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य कहा जाने लगा।
गणेश चतुर्थी और चंद्रमा की कथा
गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा चंद्रदेव के बारे में है।
एक बार भगवान गणेश भक्तों द्वारा अर्पित मोदक और अन्य प्रसाद स्वीकार करके अपने मूषक वाहन पर जा रहे थे। रास्ते में मूषक का संतुलन बिगड़ गया और गणेश नीचे गिर पड़े।
यह देखकर चंद्रदेव हंसने लगे। चंद्रमा को अपने सुंदर रूप पर गर्व था और उन्होंने गणेश के स्वरूप का उपहास किया।
चंद्रदेव का अहंकार देखकर भगवान गणेश ने उन्हें श्राप दिया:
“आज से जो भी तुम्हारा दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लग सकता है।”
चंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और श्राप वापस लेने की प्रार्थना की।
गणेश ने श्राप को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, लेकिन उसका प्रभाव सीमित कर दिया। इसी कथा से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रदर्शन न करने की परंपरा जोड़ी जाती है।
कुछ परंपराओं में माना जाता है कि यदि भूल से चंद्रदर्शन हो जाए, तो भगवान गणेश का स्मरण करना और श्रीकृष्ण तथा स्यमंतक मणि की कथा सुनना चाहिए।
गणेश चतुर्थी की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
- कर्तव्यनिष्ठा: गणेश ने माता की आज्ञा पूरी निष्ठा से निभाई।
- संवाद: गलतफहमी बढ़ने से पहले शांत संवाद जरूरी है।
- अहंकार का त्याग: चंद्रमा की कथा रूप और सामर्थ्य के गर्व से बचने की सीख देती है।
- गलती सुधारना: कठिन परिस्थिति के बाद भी सुधार और नई शुरुआत संभव है।
- माता-पिता का सम्मान: गणेश की माता पार्वती के प्रति निष्ठा आदर्श मानी जाती है।
- सोचकर शुरुआत करना: हर कार्य से पहले योजना और विवेक आवश्यक है।
गणेश चतुर्थी की कथा कब पढ़ें?
गणेश स्थापना और मुख्य पूजा के बाद कथा पढ़ी जा सकती है। सामान्य पूजा क्रम इस प्रकार है:
- पूजा स्थान को साफ करना
- गणेश प्रतिमा स्थापित करना
- संकल्प और आवाहन करना
- गंध, अक्षत, फूल और दूर्वा अर्पित करना
- मोदक या अन्य भोग लगाना
- गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ना
- मंत्र जप और आरती करना
- प्रसाद बांटना
परिवार के सभी सदस्य मिलकर कथा सुनें, तो बच्चों को त्योहार का अर्थ और उससे जुड़े संस्कार आसानी से समझ में आते हैं।
गणेश चतुर्थी पूजा के प्रमुख मंत्र
गणेश मूल मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः।
वक्रतुंड महाकाय मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
गणेश गायत्री मंत्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
गणेश चतुर्थी पर कौन-सा भोग लगाएं?
भगवान गणेश को मोदक विशेष प्रिय माने जाते हैं। इसके अलावा ये भोग अर्पित किए जा सकते हैं:
- मोदक
- लड्डू
- खीर
- पूरनपोली
- फल
- गुड़ और नारियल
- पंचमेवा
- सात्त्विक घर का भोजन
भोग ताजा, स्वच्छ और श्रद्धा से तैयार किया हुआ होना चाहिए।
गणेश चतुर्थी की कथा संक्षेप में
माता पार्वती ने उबटन से गणेश की रचना की और उन्हें द्वार की रक्षा करने का आदेश दिया। गणेश ने भगवान शिव को भी भीतर प्रवेश नहीं दिया। संघर्ष में उनका मस्तक अलग हो गया। बाद में हाथी का मस्तक जोड़कर उन्हें पुनः जीवन दिया गया। भगवान शिव ने उन्हें सभी गणों का स्वामी और हर शुभ कार्य में प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है?
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को।
2. गणेश की रचना किसने की?
माता पार्वती ने।
3. गणेश को हाथी का मस्तक क्यों लगाया गया?
उन्हें पुनः जीवन देने के लिए।
4. गणेश प्रथम पूज्य क्यों हैं?
भगवान शिव ने उन्हें यह वरदान दिया।
5. गणेश चतुर्थी पर चंद्रदर्शन क्यों नहीं करते?
चंद्रदेव को मिले श्राप की कथा के कारण।
6. कथा कब पढ़नी चाहिए?
पूजा और भोग के बाद।
7. गणेश का प्रिय भोग क्या है?
मोदक।
8. क्या घर पर कथा पढ़ सकते हैं?
हां, कोई भी श्रद्धापूर्वक पढ़ सकता है।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी की कथा भगवान गणेश के जन्म के साथ कर्तव्य, माता-पिता के सम्मान, विनम्रता और अहंकार त्याग का संदेश देती है।
गणेश को प्रथम पूज्य मानने का भाव यह है कि हर कार्य की शुरुआत सोच-विचार, सही योजना और विनम्रता से की जाए। पूजा और उत्सव के साथ कथा में छिपे जीवन मूल्यों को अपनाना भी आवश्यक है।
हे भगवान गणेश, हमें सही निर्णय लेने की बुद्धि, कर्तव्य निभाने का साहस और सफलता में विनम्र बने रहने की प्रेरणा दें।
गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया!
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