संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण मासिक व्रत है। प्रत्येक हिंदू चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। “संकष्टी” का सामान्य अर्थ संकटों से मुक्ति दिलाने वाली चतुर्थी माना जाता है। इसलिए इस दिन भक्त उपवास, गणेश पूजन, मंत्र-जप, व्रत कथा और चंद्र दर्शन करके विघ्नहर्ता भगवान गणेश से बुद्धि, धैर्य और उचित मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं।
महाराष्ट्र सहित भारत के अनेक भागों में संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह व्रत का संकल्प लिया जाता है। शाम को भगवान गणेश की पूजा की जाती है और स्थानीय चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है।
इस लेख में संकष्टी चतुर्थी 2026 की सभी तारीखें, मुंबई का चंद्रोदय समय, अंगारकी संकष्टी की जानकारी, पारंपरिक व्रत कथा, उपवास के नियम और घर पर संपूर्ण पूजा विधि दी गई है।
संकष्टी चतुर्थी क्या है?
पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चौथी तिथि को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह दिन भगवान गणेश की आराधना के लिए समर्पित होता है।
भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। संकष्टी चतुर्थी पर उनकी पूजा करके भक्त जीवन की कठिनाइयों का सामना सही सोच और धैर्य से करने की शक्ति मांगते हैं।
इस व्रत में सामान्यतः निम्न धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं:
- सुबह व्रत का संकल्प
- दिनभर उपवास या फलाहार
- शाम को भगवान गणेश की पूजा
- दूर्वा, फूल और नैवेद्य अर्पित करना
- गणेश मंत्र या स्तोत्र का पाठ
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ना या सुनना
- स्थानीय चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य
- आरती और प्रसाद के बाद व्रत पूरा करना
संकष्टी चतुर्थी 2026 की तारीख और चंद्रोदय समय
नीचे दिए गए चंद्रोदय के समय मुंबई के लिए हैं। दिल्ली, पुणे, नाशिक, नागपुर, इंदौर, जयपुर, अहमदाबाद और दूसरे शहरों में चंद्रमा निकलने का समय अलग हो सकता है।
| महीना | संकष्टी चतुर्थी की तारीख | दिन | मुंबई में चंद्रोदय | विशेष जानकारी |
|---|---|---|---|---|
| जनवरी | 6 जनवरी 2026 | मंगलवार | रात 9:22 बजे | अंगारकी संकष्टी |
| फरवरी | 5 फरवरी 2026 | गुरुवार | रात 9:48 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| मार्च | 6 मार्च 2026 | शुक्रवार | रात 9:19 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| अप्रैल | 5 अप्रैल 2026 | रविवार | रात 9:47 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| मई | 5 मई 2026 | मंगलवार | रात 10:19 बजे | अंगारकी संकष्टी |
| जून | 3 जून 2026 | बुधवार | रात 9:52 बजे | अधिकमास की विभुवन संकष्टी |
| जुलाई | 3 जुलाई 2026 | शुक्रवार | रात 9:52 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| अगस्त | 2 अगस्त 2026 | रविवार | रात 9:37 बजे | महीने की पहली संकष्टी |
| अगस्त | 31 अगस्त 2026 | सोमवार | रात 8:51 बजे | महीने की दूसरी संकष्टी |
| सितंबर | 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | रात 8:14 बजे | अंगारकी संकष्टी |
| अक्टूबर | 29 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | रात 8:53 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| नवंबर | 27 नवंबर 2026 | शुक्रवार | रात 8:51 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
| दिसंबर | 26 दिसंबर 2026 | शनिवार | रात 8:45 बजे | संकष्टी चतुर्थी |
महत्वपूर्ण सूचना: संकष्टी चतुर्थी की तिथि और चंद्रोदय समय शहर तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं। विशेष रूप से जून 2026 की संकष्टी के विषय में अलग-अलग पंचांगों में 3 और 4 जून का मत मिलता है। व्रत रखने से पहले अपने शहर का विश्वसनीय स्थानीय पंचांग अवश्य जांचें।
2026 में अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कब है?
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को आती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।
2026 में तीन अंगारकी संकष्टी चतुर्थी हैं:
- 6 जनवरी 2026 – मंगलवार
- 5 मई 2026 – मंगलवार
- 29 सितंबर 2026 – मंगलवार
मंगलवार और गणेश उपासना का संयोग होने के कारण अंगारकी संकष्टी को विशेष माना जाता है। इस दिन गणेश मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्त दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
संकष्टी और विनायकी चतुर्थी में क्या अंतर है?
| संकष्टी चतुर्थी | विनायकी चतुर्थी |
|---|---|
| कृष्ण पक्ष की चतुर्थी | शुक्ल पक्ष की चतुर्थी |
| पूर्णिमा के बाद आती है | अमावस्या के बाद आती है |
| चंद्रोदय के बाद व्रत खोलने की परंपरा | सामान्यतः चंद्र दर्शन का नियम नहीं |
| संकट निवारण और गणेश उपासना से संबंधित | शुभारंभ, बुद्धि और गणेश कृपा के लिए उपासना |
| मंगलवार को आने पर अंगारकी संकष्टी | वार के अनुसार नाम नहीं बदलता |
संकष्टी चतुर्थी में चंद्रोदय का क्या महत्व है?
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रोदय को व्रत पूर्ण होने का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। भक्त दिनभर उपवास रखते हैं, शाम को गणेश पूजन करते हैं और चंद्रमा निकलने के बाद उसे अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं।
चंद्रमा को मन, भावनाओं, शीतलता और समय के चक्र का प्रतीक माना जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय मन की अस्थिरता दूर होने, शांति मिलने और विवेक बढ़ने की प्रार्थना की जाती है।
व्रत अपने शहर के स्थानीय चंद्रोदय समय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही पूरा करना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी का व्रत कौन रख सकता है?
भगवान गणेश में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार यह व्रत रख सकता है।
- महिलाएं और पुरुष
- विवाहित और अविवाहित व्यक्ति
- विद्यार्थी
- नौकरी या व्यवसाय करने वाले लोग
- वरिष्ठ नागरिक
- पूर्ण उपवास न कर सकने वाले फलाहार करने वाले भक्त
बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों या नियमित दवा लेने वाले लोगों को कठोर उपवास करने की आवश्यकता नहीं है।
स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले उपवास के स्थान पर अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार करके श्रद्धा से पूजा करना अधिक उचित है।
संकष्टी चतुर्थी के उपवास के प्रकार
व्रत की पद्धति परिवार और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार बदल सकती है।
निर्जल उपवास
इस उपवास में चंद्रोदय तक अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता। यह कठिन व्रत है और सभी लोगों के लिए उपयुक्त नहीं होता।
जलाहार
इसमें भक्त दिनभर केवल पानी ग्रहण करते हैं।
दूध और फलों का उपवास
इस प्रकार के व्रत में दूध, फल, सूखे मेवे और नारियल पानी लिया जा सकता है।
फलाहार
फलाहार में साबूदाना, राजगिरा, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू, शकरकंद, मूंगफली, फल और व्रत में मान्य भोजन लिया जाता है।
एकभुक्त व्रत
चंद्रोदय, पूजा और अर्घ्य के बाद दिन में केवल एक बार सात्त्विक भोजन किया जाता है।
अपने स्वास्थ्य, आयु और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास का उपयुक्त प्रकार चुनना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में क्या खा सकते हैं?
अपनी उपवास परंपरा के अनुसार निम्न पदार्थ ग्रहण किए जा सकते हैं:
- ताजे फल
- दूध और दही
- साबूदाना खिचड़ी या साबूदाना वड़ा
- राजगिरा
- कुट्टू या सिंघाड़े का आटा
- आलू और शकरकंद
- सामा के चावल
- मूंगफली
- सूखे मेवे
- नारियल पानी
- सेंधा नमक
- ताजा फलों का रस
व्रत खोलने के बाद हल्का, ताजा और सात्त्विक भोजन करना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
परिवार और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार निम्न पदार्थों से परहेज किया जाता है:
- गेहूं और सामान्य आटा
- साधारण चावल
- दाल और सामान्य अनाज
- सामान्य नमक
- प्याज और लहसुन
- मांसाहार
- शराब और तंबाकू
- बासी या अत्यधिक तला हुआ भोजन
व्रत के नियम परिवार, क्षेत्र और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकते हैं।
संकष्टी चतुर्थी पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
घर पर सरल पूजा के लिए निम्न सामग्री रखी जा सकती है:
- भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र
- साफ चौकी या पाट
- लाल या पीला कपड़ा
- हल्दी और कुमकुम
- अक्षत
- चंदन या अष्टगंध
- सिंदूर
- ताजी दूर्वा
- लाल गुड़हल या अन्य ताजा फूल
- फूलों की माला
- घी या तेल का दीपक
- रुई की बत्तियां
- धूप या अगरबत्ती
- कपूर
- मोदक या लड्डू
- ताजे फल
- गुड़ और नारियल
- नारियल
- पान के पत्ते और सुपारी
- चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए तांबे का लोटा
- साफ पानी
- थोड़ा दूध
- व्रत कथा या पूजा पुस्तक
- आरती की थाली
सभी सामग्री उपलब्ध न होने पर भी उपलब्ध वस्तुओं से श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है।
संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि हिंदी
1. सुबह स्नान और पूजा स्थान की सफाई करें
सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। घर के मंदिर और पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें।
भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाकर प्रणाम करें।
2. व्रत का संकल्प लें
हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प करें।
अपने परिवार के स्वास्थ्य, सुख, शांति, सद्बुद्धि और सभी के कल्याण के लिए मैं श्रद्धापूर्वक संकष्टी चतुर्थी का व्रत और भगवान श्री गणेश का पूजन कर रहा या रही हूं।
इसके बाद हाथ का पानी किसी साफ पात्र में छोड़ दें।
3. दिनभर उपवास या फलाहार करें
अपने स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूर्ण उपवास, जलाहार या फलाहार करें।
दिनभर शांत रहने, सत्य बोलने और सकारात्मक विचार रखने का प्रयास करें। अनावश्यक क्रोध, विवाद और कटु वचन से बचें।
4. शाम को पूजा की तैयारी करें
चंद्रोदय से पहले पूजा का स्थान साफ करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर रखें।
दीपक, धूप, फूल, दूर्वा, नैवेद्य और अर्घ्य का जल व्यवस्थित रखें।
5. दीप प्रज्वलित करें
घी या तेल का दीपक जलाकर यह प्रार्थना करें:
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
6. भगवान गणेश का ध्यान करें
आंखें बंद करके भगवान गणेश के शांत और प्रसन्न स्वरूप का ध्यान करें।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
7. भगवान गणेश का आवाहन करें
फूल और अक्षत अर्पित करते हुए कहें:
ॐ गं गणपतये नमः। श्री महागणपतिं आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि।
यदि घर में स्थायी रूप से स्थापित मूर्ति है, तो औपचारिक आवाहन आवश्यक नहीं है। प्रणाम करके पूजा आरंभ की जा सकती है।
8. हल्दी, कुमकुम, चंदन और अक्षत अर्पित करें
भगवान गणेश को चंदन या अष्टगंध का तिलक लगाएं। इसके बाद हल्दी, कुमकुम, सिंदूर और अक्षत अर्पित करें।
ॐ गणपतये नमः। गंधाक्षतान् समर्पयामि।
यदि मूर्ति पर सामग्री लगाने से उसका रंग खराब हो सकता हो, तो सामग्री को सामने रखे पात्र में अर्पित करें।
9. फूल और दूर्वा अर्पित करें
भगवान गणेश को लाल गुड़हल या कोई ताजा फूल अर्पित करें। इसके बाद साफ दूर्वा चढ़ाएं।
ॐ गं गणपतये नमः। पुष्पाणि दूर्वांकुरान् समर्पयामि।
कुछ परंपराओं में 21 दूर्वा या 21 दूर्वा की गांठें अर्पित की जाती हैं। यह संख्या अनिवार्य नहीं है।
10. भगवान गणेश के बारह नामों से अर्चना करें
प्रत्येक नाम के बाद फूल, अक्षत या दूर्वा अर्पित करें:
ॐ सुमुखाय नमः।
ॐ एकदन्ताय नमः।
ॐ कपिलाय नमः।
ॐ गजकर्णकाय नमः।
ॐ लंबोदराय नमः।
ॐ विकटाय नमः।
ॐ विघ्ननाशाय नमः।
ॐ विनायकाय नमः।
ॐ धूम्रकेतवे नमः।
ॐ गणाध्यक्षाय नमः।
ॐ भालचन्द्राय नमः।
ॐ गजाननाय नमः।
11. धूप और दीप अर्पित करें
धूप या अगरबत्ती दिखाएं और उसके बाद दीपक अर्पित करें।
ॐ गणपतये नमः। धूपमाघ्रापयामि। दीपं दर्शयामि।
12. नैवेद्य अर्पित करें
मोदक, लड्डू, फल, गुड़-नारियल या उपवास में मान्य सात्त्विक भोजन अर्पित करें।
ॐ गणपतये नमः। नैवेद्यं निवेदयामि।
नैवेद्य को कुछ समय भगवान के सामने रखें और पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद के रूप में बांटें।
13. गणेश मंत्र का जप करें
शांत होकर निम्न मंत्र का 11, 21 या 108 बार जप किया जा सकता है:
ॐ गं गणपतये नमः।
गणेश गायत्री मंत्र:
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
14. गणपति अथर्वशीर्ष या स्तोत्र का पाठ करें
समय और परंपरा के अनुसार निम्न में से कोई एक पाठ किया जा सकता है:
- गणपति अथर्वशीर्ष
- संकटनाशन गणेश स्तोत्र
- गणेश द्वादश नाम स्तोत्र
- गणेश चालीसा
- गणेश गायत्री मंत्र
- गणेश कवच
15. संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें
गणेश पूजन के बाद संकष्टी चतुर्थी की पारंपरिक व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
कथा के बाद उसके संदेश पर विचार करें और सत्य, विवेक, विनम्रता तथा उचित व्यवहार अपनाने का संकल्प लें।
16. भगवान गणेश की आरती करें
कपूर या दीपक से भगवान गणेश की आरती करें।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कोई अन्य गणेश आरती गाई जा सकती है।
17. चंद्रोदय की प्रतीक्षा करें
पूजा के बाद अपने शहर में चंद्रमा निकलने के निर्धारित समय तक प्रतीक्षा करें।
चंद्रोदय का समय स्थानीय पंचांग से जांचें, क्योंकि अलग-अलग शहरों में कुछ मिनटों से लेकर अधिक समय तक अंतर हो सकता है।
18. चंद्रमा को अर्घ्य दें
चंद्रमा निकलने के बाद तांबे के लोटे में साफ पानी लें। पारिवारिक परंपरा के अनुसार उसमें थोड़ा दूध, अक्षत और फूल मिलाया जा सकता है।
अर्घ्य देते समय कहें:
ॐ सोमाय नमः।
या यह मंत्र बोलें:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
अर्घ्य का पानी किसी साफ पात्र, मिट्टी या पौधे के पास गिराएं। ध्यान रखें कि वह नीचे खड़े लोगों या किसी दूसरे घर में न गिरे।
19. चंद्रमा को नैवेद्य दिखाएं
कुछ पारिवारिक परंपराओं में भगवान गणेश को अर्पित नैवेद्य का एक भाग चंद्रमा को दिखाया जाता है।
यह विधि अपनी स्थानीय या पारिवारिक परंपरा के अनुसार की जा सकती है।
20. क्षमा प्रार्थना करें
पूजा या व्रत में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें:
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
सरल हिंदी में:
हे भगवान गणेश, मुझसे जाने-अनजाने हुई सभी गलतियों को क्षमा करके मेरा व्रत और पूजन स्वीकार करें।
21. व्रत पूरा करें
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश को प्रणाम करें और प्रसाद ग्रहण करें। इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्त्विक भोजन करके उपवास खोलें।
लंबे उपवास के तुरंत बाद बहुत भारी, तला हुआ या मसालेदार भोजन करने से बचें।
चंद्रमा दिखाई न दे तो संकष्टी का व्रत कैसे खोलें?
बारिश, बादल, धुंध या ऊंची इमारतों के कारण चंद्रमा दिखाई न दे तो घबराने की आवश्यकता नहीं है।
- अपने शहर का विश्वसनीय पंचांग वाला चंद्रोदय समय जांचें।
- निर्धारित समय के बाद कुछ मिनट प्रतीक्षा करें।
- चंद्रमा की दिशा में मन ही मन प्रणाम करें।
- “ॐ सोमाय नमः” बोलते हुए अर्घ्य अर्पित करें।
- गणेश आरती करके व्रत पूर्ण करें।
इस विषय में अपने परिवार की परंपरा या जानकार पुरोहित का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा हिंदी
नीचे भगवान शिव, माता पार्वती और एक बालक से संबंधित संकष्टी चतुर्थी की प्रचलित लोकपरंपरागत कथा दी गई है। विभिन्न क्षेत्रों में इस कथा के विवरणों में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
भगवान शिव, माता पार्वती और बालक की कथा
एक समय भगवान शिव और माता पार्वती नदी के किनारे बैठे हुए थे। दोनों ने चौसर खेलने का विचार किया। खेल में कौन जीता और कौन हारा, इसका निष्पक्ष निर्णय देने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की आवश्यकता थी।
माता पार्वती ने पास में उपलब्ध मिट्टी या घास से एक बालक की प्रतिमा बनाई और अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण डाल दिए।
माता पार्वती ने बालक से कहा, “हम दोनों चौसर खेलेंगे। तुम खेल को ध्यान से देखना और अंत में सत्य बताना कि कौन जीता है।”
बालक ने आज्ञा स्वीकार कर ली।
भगवान शिव और माता पार्वती ने खेल आरंभ किया। प्रचलित कथा के अनुसार माता पार्वती खेल जीत गईं, लेकिन बालक ने भूलवश या पक्षपात करते हुए भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया।
दोबारा खेल हुआ और माता पार्वती फिर जीतीं, लेकिन बालक ने दोबारा भगवान शिव को विजेता बता दिया।
बार-बार गलत निर्णय सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं। उन्होंने बालक को अपनी भूल का परिणाम भोगने का शाप दिया। कुछ कथाओं में कहा गया है कि उसके पैर दुर्बल हो गए, जबकि कुछ परंपराओं में बताया गया है कि वह कीचड़ या कष्टपूर्ण अवस्था में फंस गया।
बालक को अपनी गलती का अनुभव हुआ। उसने माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी।
उसने कहा, “माता, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने जानबूझकर आपका अपमान नहीं किया। कृपया मुझे इस संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताएं।”
बालक का पश्चात्ताप देखकर माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा, “दिया गया शाप पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन भगवान गणेश की उपासना तुम्हें संकट से मुक्ति का मार्ग दिखा सकती है। संकष्टी चतुर्थी के दिन यहां कुछ भक्त या नाग कन्याएं गणेश पूजा करने आएंगी। उनसे व्रत की विधि सीखकर श्रद्धापूर्वक व्रत करना।”
कुछ समय बाद संकष्टी चतुर्थी के दिन वहां भगवान गणेश की पूजा करने वाली भक्त महिलाएं आईं। बालक ने उनसे व्रत के नियम, पूजा विधि, मंत्र और चंद्रमा को अर्घ्य देने की पद्धति सीखी।
बालक ने श्रद्धापूर्वक संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। उसने भगवान गणेश की पूजा की, दूर्वा और फूल अर्पित किए, व्रत कथा सुनी और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया।
बालक की भक्ति और पश्चात्ताप से भगवान गणेश प्रसन्न हुए।
भगवान गणेश ने उसे दर्शन देकर पूछा, “बालक, तुम कौन-सा वर चाहते हो?”
बालक ने उत्तर दिया, “हे विघ्नहर्ता, मेरी गलती का प्रायश्चित्त हो जाए। मेरा संकट दूर करें और मुझे दोबारा माता पार्वती तथा भगवान शिव के चरणों तक पहुंचने का अवसर दें।”
भगवान गणेश ने उसका संकट दूर कर दिया और उसे उचित मार्ग दिखाया। बालक स्वस्थ होकर भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचा।
उसने माता पार्वती से क्षमा मांगी। माता पार्वती ने उसका पश्चात्ताप और बदला हुआ व्यवहार देखकर उसे आशीर्वाद दिया।
इस प्रकार भगवान गणेश की उपासना से बालक का संकट दूर हुआ। धार्मिक मान्यता के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत भक्त को जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए बुद्धि, संयम और उचित मार्गदर्शन प्रदान करने की प्रेरणा देता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का संदेश
इस कथा से निम्न शिक्षाएं मिलती हैं:
- निर्णय देते समय सत्य और निष्पक्षता का पालन करना चाहिए।
- गलती का अनुभव होने पर ईमानदारी से पश्चात्ताप करना चाहिए।
- क्षमा मांगने के साथ व्यवहार में सुधार करना भी आवश्यक है।
- भक्ति केवल इच्छाएं मांगना नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारना भी है।
- संकट से निकलने के लिए धैर्य, बुद्धि और निरंतर प्रयास जरूरी हैं।
- भगवान गणेश की उपासना विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा देती है।
संकष्टी चतुर्थी के दिन बोलने वाले मंत्र
गणेश मूल मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः।
वक्रतुंड महाकाय मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
गणेश गायत्री मंत्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
संकटनाशन प्रार्थना
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये॥
चंद्र अर्घ्य मंत्र
ॐ सोमाय नमः।
संकष्टी चतुर्थी व्रत का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक श्रद्धा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से निम्न आध्यात्मिक और मानसिक लाभ अनुभव किए जा सकते हैं:
- भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा मजबूत होती है।
- मन को एकाग्र और शांत करने में सहायता मिलती है।
- कठिनाइयों का धैर्य से सामना करने की प्रेरणा मिलती है।
- सोच-समझकर निर्णय लेने की भावना विकसित होती है।
- आहार और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का अभ्यास होता है।
- परिवार में सामूहिक पूजा और संस्कारों की परंपरा बनी रहती है।
- विनम्रता और कृतज्ञता की भावना बढ़ती है।
- चिंता और नकारात्मकता कम करने के लिए प्रार्थना का आधार मिलता है।
ये लाभ धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हैं। व्रत या पूजा को चिकित्सा, आर्थिक योजना या विशेषज्ञ सलाह का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी के दिन कौन-से शुभ कार्य किए जा सकते हैं?
- भगवान गणेश के मंदिर में दर्शन करें।
- गणपति अथर्वशीर्ष या गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
- जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या आवश्यक वस्तुएं दान करें।
- पक्षियों और पशुओं के लिए भोजन तथा पानी रखें।
- परिवार के साथ शांतिपूर्वक आरती करें।
- किसी एक गलत आदत को छोड़ने का संकल्प लें।
- विद्यार्थियों को पुस्तकें या शैक्षणिक सामग्री दान करें।
- अन्न और पानी की बर्बादी से बचें।
संकष्टी चतुर्थी के दिन किन बातों से बचना चाहिए?
- स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला कठोर उपवास
- क्रोध, विवाद और कटु वचन
- भोजन और पानी की बर्बादी
- बासी या अशुद्ध नैवेद्य
- दीपक या कपूर को असुरक्षित रखना
- भय या अंधविश्वास पर आधारित उपाय
- चमत्कार या निश्चित फल की गारंटी देने वाले दावे
- बीमार व्यक्ति को उपवास के लिए मजबूर करना
- स्थानीय चंद्रोदय समय जांचे बिना व्रत खोलना
संकष्टी चतुर्थी 2026 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वर्ष 2026 में संकष्टी चतुर्थी कितनी बार है?
2026 में कुल 13 संकष्टी चतुर्थियां हैं। अगस्त में 2 अगस्त और 31 अगस्त को दो संकष्टी चतुर्थियां पड़ रही हैं।
2. 2026 में अंगारकी संकष्टी कब है?
2026 में 6 जनवरी, 5 मई और 29 सितंबर को अंगारकी संकष्टी चतुर्थी है।
3. संकष्टी चतुर्थी का व्रत कितने बजे खोलना चाहिए?
अपने शहर के चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर और भगवान गणेश की आरती करके व्रत खोलना चाहिए। चंद्रोदय का समय प्रत्येक शहर में अलग होता है।
4. चंद्रमा दिखाई न दे तो क्या व्रत खोल सकते हैं?
बादल या बारिश के कारण चंद्रमा दिखाई न दे तो स्थानीय पंचांग के निर्धारित चंद्रोदय समय के बाद चंद्रमा को मन ही मन प्रणाम करके अर्घ्य दिया जा सकता है।
5. क्या संकष्टी चतुर्थी पर पूर्ण उपवास आवश्यक है?
नहीं। स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार फलाहार, दूध-फल, जलाहार या एकभुक्त व्रत किया जा सकता है। स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला उपवास नहीं करना चाहिए।
6. संकष्टी चतुर्थी पर कौन-सा नैवेद्य चढ़ाएं?
मोदक, लड्डू, फल, गुड़-नारियल, खीर या व्रत में मान्य सात्त्विक भोजन अर्पित किया जा सकता है।
7. संकष्टी पूजा में कितनी दूर्वा अर्पित करनी चाहिए?
कुछ परंपराओं में 21 दूर्वा या 21 दूर्वा की गांठें अर्पित की जाती हैं। हालांकि यह संख्या अनिवार्य नहीं है। उपलब्धता के अनुसार एक साफ गुच्छा भी अर्पित किया जा सकता है।
8. क्या महिलाएं संकष्टी चतुर्थी का व्रत रख सकती हैं?
हां। महिलाएं, पुरुष, विवाहित, अविवाहित और वरिष्ठ नागरिक अपने स्वास्थ्य और श्रद्धा के अनुसार यह व्रत रख सकते हैं।
9. क्या गर्भवती महिलाओं को संकष्टी का उपवास रखना चाहिए?
गर्भवती महिलाओं को कठोर उपवास करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। पूजा, मंत्र-जप और पौष्टिक फलाहार के माध्यम से भी व्रत का भाव रखा जा सकता है।
10. क्या गणपति अथर्वशीर्ष पढ़ना आवश्यक है?
गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ शुभ माना जाता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र, गणेश चालीसा, स्तोत्र या आरती भी की जा सकती है।
11. संकष्टी और अंगारकी संकष्टी में क्या अंतर है?
हर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी होती है। जब यही चतुर्थी मंगलवार को आती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी कहा जाता है।
12. संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा की पूजा क्यों होती है?
संकष्टी व्रत को चंद्रोदय के बाद पूरा करने की धार्मिक परंपरा है। चंद्रमा को अर्घ्य देकर मानसिक शांति, संयम और शीतलता की प्रार्थना की जाती है।
निष्कर्ष
संकष्टी चतुर्थी केवल भोजन न करने का व्रत नहीं, बल्कि संयम, सत्य, विनम्रता और विवेक का अभ्यास करने का अवसर है।
2026 में कुल 13 संकष्टी चतुर्थियां हैं और जनवरी, मई तथा सितंबर में अंगारकी संकष्टी का संयोग बन रहा है। प्रत्येक संकष्टी पर अपने शहर का सही चंद्रोदय समय जांचकर चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पूरा करना चाहिए।
विस्तृत पूजा संभव न हो तो दीपक, फूल, दूर्वा, सरल नैवेद्य, गणेश मंत्र और आरती के माध्यम से भी पूजा की जा सकती है। उपवास करते समय स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और केवल चमत्कार की अपेक्षा करने के बजाय अच्छे विचार, ईमानदार प्रयास, धैर्य और सदाचार को जीवन में अपनाएं।
हे भगवान गणेश, हमें संकटों से भागने के बजाय उनका बुद्धि, धैर्य और साहस के साथ सामना करने की शक्ति प्रदान करें।
गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया!
संकष्टी चतुर्थी – तारीख, चंद्रोदय समय, व्रत कथा और संपूर्ण पूजा विधि
સંકષ્ટી ચતુર્થી – ચંદ્રોદય સમય, વ્રતકથા અને સંપૂર્ણ પૂજા વિધિ ગુજરાતી
संकष्टी चतुर्थी – तारीख, चंद्रोदय वेळ, व्रत कथा आणि संपूर्ण पूजा विधी मराठी
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हिंदी में गणेशजी के पाठ और पूजा मार्गदर्शिका
- गणेश चालीसा
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– भगवान गणपति को ब्रह्म, ज्ञान और संपूर्ण सृष्टि के आधार के रूप में प्रस्तुत करने वाला वैदिक स्तोत्र। - श्री गणपति अथर्वशीर्ष
– गणपति अथर्वशीर्ष का हिंदी पाठ, सरल अर्थ, धार्मिक महत्त्व और पाठ के लाभ जानें। - संकटनाशन गणेश स्तोत्र
– जीवन की बाधाओं और संकटों को दूर करने की प्रार्थना के लिए समर्पित प्रसिद्ध गणेश स्तोत्र। - गणेश द्वादश नाम स्तोत्र
– भगवान गणेश के बारह पवित्र नामों और उनके आध्यात्मिक महत्त्व का भक्तिमय स्तवन। - महागणेश पंचरत्न स्तोत्र
– पांच दिव्य श्लोकों में भगवान गणेश के स्वरूप, गुण और कृपा का वर्णन करने वाला स्तोत्र। - श्री गणेश कवच
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